अनुच्छेद 21 के अंतर्गत पीड़ितों के मुआवजे हेतु “संवैधानिक क्षतिपूर्ति (Constitutional Compensation / Public Law Remedy)” का सिद्धांत
भारत के संविधान का अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की गारंटी देता है। जब राज्य या उसके अभिकर्ताओं के अवैध कृत्यों से इस अधिकार का उल्लंघन होता है, तब पीड़ितों को त्वरित और प्रभावी राहत देने हेतु उच्चतम न्यायालय ने संवैधानिक क्षतिपूर्ति का सिद्धांत विकसित किया।
1. सिद्धांत का उद्भव और संवैधानिक आधार
आरंभिक दौर में मौलिक अधिकारों के उल्लंघन पर राहत प्रायः घोषणात्मक या निषेधात्मक होती थी। किंतु न्यायालय ने माना कि केवल अधिकार-उल्लंघन की घोषणा पर्याप्त नहीं है; पीड़ित को वास्तविक क्षति की भरपाई भी मिलनी चाहिए।
यहीं से अनुच्छेद 32 (उपचार का अधिकार) को अनुच्छेद 21 के साथ पढ़ते हुए Public Law Remedy के रूप में मुआवजा देने की न्यायिक परंपरा विकसित हुई।
इसका आधार यह है कि—
- राज्य मौलिक अधिकारों का संरक्षक है,
- और उसके ही कर्मियों द्वारा अधिकार-उल्लंघन होने पर राज्य उत्तरदायी होगा।
2. संवैधानिक क्षतिपूर्ति का सिद्धांत क्या है?
संवैधानिक क्षतिपूर्ति वह मुआवजा है जो—
- सीधे संविधान के अंतर्गत,
- रिट याचिका (अनुच्छेद 32 या 226) में,
- मौलिक अधिकार (विशेषतः अनुच्छेद 21) के उल्लंघन पर
प्रदान किया जाता है।
यह मुआवजा:
- टॉर्ट या दीवानी क्षतिपूर्ति से भिन्न है,
- और इसका उद्देश्य निवारण (deterrence) + पुनर्वास (rehabilitation) है।
3. प्रमुख निर्णय और सिद्धांत का विकास
(i) हिरासत में मृत्यु / अवैध निरोध
उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया कि पुलिस हिरासत, अवैध गिरफ्तारी या यातना से मृत्यु/हानि होने पर राज्य पूर्ण रूप से उत्तरदायी होगा।
यह उत्तरदायित्व सार्वजनिक कानून के अंतर्गत है और इसमें “सार्वभौमिक प्रतिरक्षा (sovereign immunity)” लागू नहीं होगी।
👉 यह दृष्टिकोण Rudul Sah v. State of Bihar, 1983, Supreme Court में स्पष्ट रूप से सामने आया, जहाँ अवैध निरोध के लिए प्रत्यक्ष मुआवजा दिया गया।
(ii) मौलिक अधिकार उल्लंघन = स्वतः मुआवजे का अधिकार
न्यायालय ने यह सिद्धांत स्थापित किया कि—
यदि अनुच्छेद 21 का उल्लंघन सिद्ध हो जाए, तो पीड़ित को मुआवजा देना न्यायालय का संवैधानिक दायित्व है।
यह सिद्धांत Nilabati Behera v. State of Odisha, 1993, Supreme Court में प्रतिपादित हुआ, जहाँ हिरासत में मृत्यु पर राज्य को मुआवजा देने का आदेश दिया गया।
(iii) मुआवजे की प्रकृति: अंतरिम और त्वरित
संवैधानिक क्षतिपूर्ति को न्यायालय ने—
- अंतरिम (interim),
- त्वरित (speedy)
और न्यूनतम न्याय के रूप में देखा है।
पीड़ित को दीवानी वाद दायर करने के अधिकार से वंचित नहीं किया जाता; संवैधानिक मुआवजा अतिरिक्त उपाय है।
यह दृष्टिकोण D.K. Basu v. State of West Bengal, 1997, Supreme Court में भी दोहराया गया।
4. सिद्धांत की प्रमुख विशेषताएँ
- राज्य की प्रत्यक्ष उत्तरदायित्व – कर्मचारी की गलती भी राज्य की जिम्मेदारी।
- सार्वभौमिक प्रतिरक्षा अस्वीकार्य – मौलिक अधिकार के मामलों में लागू नहीं।
- न्यायसंगत, तर्कसंगत और मानवाधिकार-केन्द्रित दृष्टि।
- अनुच्छेद 32/226 के अंतर्गत प्रत्यक्ष राहत।
5. निष्कर्ष
संवैधानिक क्षतिपूर्ति का सिद्धांत अनुच्छेद 21 को केवल “घोषणात्मक अधिकार” नहीं, बल्कि व्यावहारिक और प्रभावी अधिकार बनाता है।
यह सिद्धांत सुनिश्चित करता है कि—
- राज्य की मनमानी या लापरवाही से पीड़ित व्यक्ति को न्याय मिले,
- मानव गरिमा की रक्षा हो,
- और मौलिक अधिकारों के उल्लंघन पर वास्तविक जवाबदेही तय हो।
इस प्रकार, पीड़ितों के मुआवजे के क्षेत्र में यह सिद्धांत भारतीय संवैधानिक न्यायशास्त्र की एक क्रांतिकारी उपलब्धि है।
