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किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी तथा निरोध के विरुद्ध भारत के संविधान के अंतर्गत क्या संरक्षण प्रदत्त किए गए हैं? ऐसे संरक्षण के प्रति क्या विवाद है, विवेचना करें।

 

भारत के संविधान में किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी तथा निरोध (Arrest and Detention) के विरुद्ध व्यापक मौलिक संरक्षण (Safeguards) प्रदान किए गए हैं। ये संरक्षण राज्य की दमनकारी शक्ति और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच संतुलन स्थापित करते हैं। साथ ही, विशेष रूप से निवारक निरोध (Preventive Detention) को लेकर संवैधानिक व न्यायिक स्तर पर गंभीर विवाद भी रहे हैं।


Protection Under Article 22


संवैधानिक पृष्ठभूमि

व्यक्तिगत स्वतंत्रता भारतीय संविधान का मूल तत्व है।
अनुच्छेद 21 के अंतर्गत यह सिद्धांत स्थापित है कि:

“किसी व्यक्ति को उसके प्राण या दैहिक स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जाएगा।”

गिरफ्तारी और निरोध इसी स्वतंत्रता पर प्रत्यक्ष आघात करते हैं, इसलिए संविधान निर्माताओं ने अनुच्छेद 22 में विशेष सुरक्षा उपाय जोड़े।


अनुच्छेद 22 : गिरफ्तारी एवं निरोध के विरुद्ध संरक्षण

(A) साधारण गिरफ्तारी के विरुद्ध संरक्षण (Article 22(1)–(2))

(i) गिरफ्तारी के आधार की जानकारी का अधिकार

अनुच्छेद 22(1) के अनुसार:

  • गिरफ्तार व्यक्ति को शीघ्रतम समय में गिरफ्तारी के कारण बताए जाना अनिवार्य है।

📌 न्यायिक मान्यता:
Joginder Kumar v. State of U.P., 1994, Supreme Court
सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि गिरफ्तारी मनमानी नहीं हो सकती; कारणों की जानकारी अनिवार्य है।


(ii) विधिक परामर्श एवं वकील की सहायता का अधिकार

  • प्रत्येक गिरफ्तार व्यक्ति को अपनी पसंद के अधिवक्ता से परामर्श और बचाव का अधिकार है।

📌 न्यायिक दृष्टांत:
Hussainara Khatoon v. State of Bihar, 1979, Supreme Court
न्यायालय ने निःशुल्क विधिक सहायता को अनुच्छेद 21 का अभिन्न अंग माना।


(iii) 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुतिकरण

अनुच्छेद 22(2) के अनुसार:

  • गिरफ्तार व्यक्ति को 24 घंटे के भीतर निकटतम मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत करना अनिवार्य है (यात्रा समय को छोड़कर)।
  • मजिस्ट्रेट की अनुमति के बिना निरोध असंवैधानिक होगा।

📌 महत्व:
यह पुलिस हिरासत में अत्याचार और अवैध निरोध से सुरक्षा प्रदान करता है।


(B) निवारक निरोध (Preventive Detention) और उससे संबंधित संरक्षण

निवारक निरोध का उद्देश्य भविष्य में संभावित खतरों को रोकना है, न कि किसी अपराध के लिए दंड देना।

(i) निवारक निरोध की संवैधानिक मान्यता

अनुच्छेद 22(3)–(7) निवारक निरोध से संबंधित हैं।
अनुच्छेद 22(3) स्पष्ट करता है कि:

  • साधारण गिरफ्तारी के अधिकार (वकील, 24 घंटे नियम) निवारक निरोध पर लागू नहीं होते

📌 यही बिंदु सबसे अधिक विवादास्पद है।


(ii) निरोध के आधार बताने का अधिकार

अनुच्छेद 22(5):

  • निरुद्ध व्यक्ति को निरोध के आधार शीघ्र बताए जाने चाहिए
  • उसे निरोध आदेश के विरुद्ध प्रतिनिधित्व (Representation) का अवसर मिलना चाहिए।

📌 केस लॉ:
A.K. Gopalan v. State of Madras, 1950, Supreme Court
प्रारंभिक दौर में न्यायालय ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता की संकीर्ण व्याख्या की।


(iii) परामर्शदात्री बोर्ड (Advisory Board)

  • 3 माह से अधिक निरोध तभी संभव है जब
    • एक Advisory Board (न्यायिक सदस्य युक्त) यह माने कि निरोध उचित है।

📌 उद्देश्य:
कार्यपालिका की शक्ति पर न्यूनतम न्यायिक नियंत्रण।


गिरफ्तारी एवं निरोध से जुड़े प्रमुख विवाद

(A) निवारक निरोध बनाम व्यक्तिगत स्वतंत्रता

सबसे बड़ा विवाद यही है कि:

  • बिना मुकदमे, बिना साक्ष्य, केवल आशंका के आधार पर व्यक्ति को बंद रखना
  • क्या यह अनुच्छेद 21 के “न्यायसंगत, उचित और तर्कसंगत प्रक्रिया” सिद्धांत के अनुरूप है?

📌 मील का पत्थर:
Maneka Gandhi v. Union of India, 1978, Supreme Court
न्यायालय ने कहा कि प्रक्रिया मनमानी नहीं, बल्कि न्यायसंगत, उचित और तर्कसंगत होनी चाहिए।


(B) अनुच्छेद 22(3) की आलोचना

  • निवारक निरोध में:
    • वकील का अधिकार नहीं
    • मजिस्ट्रेट के समक्ष त्वरित प्रस्तुति नहीं

यह स्थिति कई विद्वानों के अनुसार:

“संविधान के भीतर एक अपवादात्मक दमनकारी व्यवस्था” है।


(C) राष्ट्रीय सुरक्षा बनाम नागरिक स्वतंत्रता

राज्य अक्सर:

  • राष्ट्रीय सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था और राज्य की अखंडता का तर्क देता है।
    वहीं नागरिक स्वतंत्रता समर्थक इसे:
  • राजनीतिक असहमति दबाने का साधन मानते हैं।

📌 न्यायिक चेतावनी:
ADM Jabalpur v. Shivkant Shukla, 1976, Supreme Court — [बाद में अप्रत्यक्ष रूप से अस्वीकार]
इस निर्णय की आज व्यापक आलोचना होती है।


निष्कर्ष

भारतीय संविधान गिरफ्तारी और निरोध के विरुद्ध मजबूत संरक्षण प्रदान करता है, विशेषकर:

  • गिरफ्तारी के कारण की सूचना
  • वकील का अधिकार
  • मजिस्ट्रेटीय निगरानी

किन्तु निवारक निरोध एक ऐसा क्षेत्र है जहाँ:

  • व्यक्तिगत स्वतंत्रता और राज्य की सुरक्षा के बीच सतत तनाव बना हुआ है।

Maneka Gandhi के बाद न्यायपालिका ने स्वतंत्रता के पक्ष में रुख मजबूत किया है, फिर भी अनुच्छेद 22(3)–(7) आज भी संवैधानिक बहस का केंद्र बने हुए हैं।

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