भारतीय संविधान में समानता की अवधारणा एवं युक्तियुक्त वर्गीकरण
(बुद्धिगम्य भेद और उद्देश्य से तार्किक संबंध के संदर्भ में)
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 समानता के अधिकार का मूल स्तंभ है। यह न केवल कानून के समक्ष समानता की गारंटी देता है, बल्कि राज्य की प्रत्येक कार्रवाई में न्याय, निष्पक्षता और गैर-मनमानी को अनिवार्य बनाता है। माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने समय-समय पर अनुच्छेद 14 की व्याख्या करते हुए युक्तियुक्त वर्गीकरण के सिद्धांत को विकसित किया, जिससे सामाजिक वास्तविकताओं के अनुरूप न्याय सुनिश्चित किया जा सके।
1. अनुच्छेद 14 के अंतर्गत समानता की अवधारणा
अनुच्छेद 14 में दो महत्वपूर्ण सिद्धांत निहित हैं—
कानून के समक्ष समानता (Equality before Law)
कानूनों का समान संरक्षण (Equal Protection of Laws)
इनका अभिप्राय यह नहीं है कि सभी व्यक्तियों के साथ हर परिस्थिति में एक-सा व्यवहार किया जाए, बल्कि यह है कि समान परिस्थितियों में समान व्यवहार और असमान परिस्थितियों में युक्तियुक्त भेद किया जा सकता है।
न्यायिक व्याख्या
State of West Bengal v. Anwar Ali Sarkar, 1952, Supreme Court
न्यायालय ने कहा कि अनुच्छेद 14 का उद्देश्य राज्य की मनमानी शक्तियों पर अंकुश लगाना है।
E. P. Royappa v. State of Tamil Nadu, 1974, Supreme Court
यह निर्णय अनुच्छेद 14 की व्याख्या में एक क्रांतिकारी मोड़ है। न्यायालय ने कहा—
“Equality is antithetic to arbitrariness.”
अर्थात् जहाँ मनमानी है, वहाँ समानता का अभाव है।
इस निर्णय के बाद समानता की अवधारणा को केवल वर्गीकरण तक सीमित न रखकर प्रशासनिक और कार्यपालिकीय मनमानी तक विस्तारित किया गया।
2. युक्तियुक्त वर्गीकरण (Reasonable Classification) का सिद्धांत
अनुच्छेद 14 पूर्ण समानता (absolute equality) की मांग नहीं करता। समाज की विविध परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए राज्य को वर्गीकरण की अनुमति है, परंतु वह युक्तियुक्त होना चाहिए।
माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने युक्तियुक्त वर्गीकरण के लिए दो-स्तरीय परीक्षण (Twin Test) निर्धारित किया है—
3. बुद्धिगम्य भेद (Intelligible Differentia)
अर्थ
बुद्धिगम्य भेद का अर्थ है कि कानून द्वारा किया गया वर्गीकरण स्पष्ट, समझने योग्य और वास्तविक आधार पर होना चाहिए।
यदि यह स्पष्ट न हो कि किस आधार पर व्यक्तियों को अलग-अलग वर्गों में रखा गया है, तो ऐसा वर्गीकरण मनमाना माना जाएगा।
उदाहरण
यदि सरकार यह प्रावधान करती है कि—
“₹8 लाख से कम वार्षिक आय वाले छात्रों को छात्रवृत्ति दी जाएगी”
यहाँ आय वर्गीकरण का स्पष्ट और समझने योग्य आधार है। अतः यह बुद्धिगम्य भेद की शर्त को पूरा करता है।
न्यायिक निर्णय
Budhan Choudhry v. State of Bihar, 1955, Supreme Court
न्यायालय ने कहा कि वर्गीकरण तभी वैध होगा जब उसका आधार स्पष्ट और बुद्धिगम्य हो।
4. उद्देश्य से तार्किक संबंध (Rational Nexus)
अर्थ
केवल स्पष्ट भेद पर्याप्त नहीं है।
उस भेद का कानून के उद्देश्य से सीधा और तार्किक संबंध भी होना चाहिए।
उदाहरण
यदि कानून का उद्देश्य आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों को सहायता देना है और वर्गीकरण आय के आधार पर किया गया है, तो उद्देश्य और वर्गीकरण के बीच प्रत्यक्ष संबंध है।
न्यायिक निर्णय
Ram Krishna Dalmia v. Justice Tendolkar, 1959, Supreme Court
न्यायालय ने कहा कि अनुच्छेद 14 वर्गीकरण को नहीं, बल्कि मनमाने वर्गीकरण को निषिद्ध करता है।
5. मनमानी का निषेध और अनुच्छेद 14 का विकास
E.P. Royappa के बाद समानता की अवधारणा और व्यापक हो गई।
अब यह सिद्धांत स्थापित हो गया कि यदि कोई राज्य कार्रवाई मनमानी, तर्कहीन या अन्यायपूर्ण है, तो वह अनुच्छेद 14 का उल्लंघन होगी।
Maneka Gandhi v. Union of India, 1978, Supreme Court
न्यायालय ने कहा कि कोई भी विधि या प्रक्रिया जो न्यायसंगत और उचित नहीं है, वह अनुच्छेद 14 और 21 दोनों का उल्लंघन करेगी।
6. International Airport Authority मामला और समानता
Ramana Dayaram Shetty v. International Airport Authority of India, 1979, Supreme Court
इस निर्णय में न्यायालय ने अनुच्छेद 14 को सरकारी ठेकों और अनुबंधों तक विस्तारित किया और कहा—
राज्य तथा उसकी एजेंसियाँ मनमाने ढंग से कार्य नहीं कर सकतीं।
यदि कोई मानदंड निर्धारित किया गया है, तो उससे विचलन अनुच्छेद 14 का उल्लंघन होगा।
समान अवसर और निष्पक्षता राज्य की प्रत्येक कार्रवाई में अनिवार्य है।
यह मामला यह स्थापित करता है कि समानता का सिद्धांत केवल कानून तक सीमित नहीं, बल्कि राज्य की प्रत्येक गतिविधि पर लागू होता है।
निष्कर्ष
इस प्रकार, भारतीय संविधान में समानता की अवधारणा एक गतिशील और विकसित होती हुई अवधारणा है।
बुद्धिगम्य भेद और उद्देश्य से तार्किक संबंध युक्तियुक्त वर्गीकरण की आधारशिला हैं, जबकि E.P. Royappa और International Airport Authority जैसे निर्णयों ने समानता को मनमानी-विरोधी और निष्पक्ष शासन का संवैधानिक सिद्धांत बना दिया है।
अतः अनुच्छेद 14 का वास्तविक उद्देश्य औपचारिक समानता नहीं, बल्कि वास्तविक और सार्थक समानता सुनिश्चित करना है।

.jpeg)