Environmental Compensation and NGT Jurisprudence
पर्यावरणीय क्षति के मामलों में Environmental Compensation (EC) आज भारत में केवल दंडात्मक उपाय नहीं, बल्कि पर्यावरण पुनर्स्थापन का एक विधिक उपकरण बन चुका है। इस विकास में National Green Tribunal (NGT) की न्यायिक भूमिका निर्णायक रही है।
1. Environmental Compensation की अवधारणा
Environmental Compensation वह मौद्रिक दायित्व है जो किसी प्रदूषक पर इसलिए लगाया जाता है ताकि—
- पर्यावरण को हुई क्षति की भरपाई (compensation) हो,
- प्राकृतिक संसाधनों का पुनर्स्थापन (restoration) किया जा सके, और
- भविष्य में प्रदूषण को निवारित (deterrence) किया जा सके।
यह अवधारणा सीधे Polluter Pays Principle से जुड़ी है, जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने भारतीय विधि का अंग माना है
[Vellore Citizens Welfare Forum v. Union of India, 1996, Supreme Court]।
2. NGT को Environmental Compensation लगाने का अधिकार
NGT की स्थापना राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 के अंतर्गत की गई।
धारा 15 के अंतर्गत NGT को यह शक्ति दी गई है कि वह—
- पर्यावरणीय क्षति के लिए राहत और मुआवज़ा,
- प्रदूषित पर्यावरण के पुनर्स्थापन की लागत,
- और पीड़ितों के लिए प्रतिपूरक उपाय
आदेशित कर सके।
यह शक्ति सिविल न्यायालय से कहीं अधिक लचीली और नीतिगत है।
3. NGT Jurisprudence का सैद्धांतिक आधार
NGT द्वारा Environmental Compensation तय करते समय निम्न सिद्धांतों का प्रयोग किया जाता है—
(i) Polluter Pays Principle
जो प्रदूषण करता है, वही उसकी पूरी आर्थिक लागत वहन करेगा
[Indian Council for Enviro-Legal Action v. Union of India, 1996, Supreme Court]।
(ii) Precautionary Principle
यदि गंभीर पर्यावरणीय क्षति की आशंका हो, तो वैज्ञानिक अनिश्चितता भी प्रदूषक के पक्ष में नहीं जाएगी
[A.P. Pollution Control Board v. Prof. M.V. Nayudu, 1999, Supreme Court]।
(iii) Sustainable Development
विकास की अनुमति तभी, जब पर्यावरणीय संतुलन सुरक्षित रहे
[Vellore Citizens Welfare Forum case, 1996, Supreme Court]।
4. Environmental Compensation तय करने के मानदंड (NGT Approach)
NGT ने समय के साथ व्यावहारिक मानदंड (criteria) विकसित किए हैं, जैसे—
- प्रदूषण की प्रकृति और गंभीरता
- प्रभावित क्षेत्र और जनसंख्या
- प्रदूषण की अवधि (duration)
- आर्थिक लाभ जो प्रदूषक ने कमाया
- Restoration Cost (वैज्ञानिक रिपोर्ट के आधार पर)
NGT अक्सर CPCB (Central Pollution Control Board) और विशेषज्ञ समितियों की रिपोर्ट पर निर्भर करता है
[Paryavaran Suraksha Samiti v. Union of India, 2017, Supreme Court]।
5. प्रमुख NGT निर्णय (Environmental Compensation)
(i) Municipal Solid Waste Management मामलों में
NGT ने अनेक मामलों में नगर निगमों पर भारी EC लगाई, यह कहते हुए कि—
राज्य या स्थानीय निकाय होने मात्र से प्रदूषण का उत्तरदायित्व समाप्त नहीं हो जाता
[Almitra H. Patel v. Union of India, 2000, Supreme Court – सिद्धांत की पुष्टि]।
(ii) Industrial Pollution Cases
औद्योगिक इकाइयों पर EC लगाते समय NGT ने यह स्पष्ट किया कि—
- “Closure + Compensation” दोनों समानांतर चल सकते हैं।
- EC केवल दंड नहीं, बल्कि environmental restoration fund है।
(iii) River Pollution Cases
नदियों में अनुपचारित अपशिष्ट डालने पर—
- उद्योग,
- नगर निकाय,
- और राज्य एजेंसियाँ
तीनों उत्तरदायी ठहराई गईं
[M.C. Mehta v. Union of India (Ganga Pollution cases), [VERIFY]]।
6. Supreme Court और NGT: सामंजस्यपूर्ण दृष्टिकोण
सर्वोच्च न्यायालय ने बार-बार NGT की EC लगाने की शक्ति को वैध और आवश्यक माना है।
Goel Ganga Developers v. Union of India, 2018, Supreme Court में कहा गया कि—
पर्यावरणीय स्वीकृति के उल्लंघन पर Environmental Compensation विकास की अनुमति की शर्त हो सकती है।
इससे स्पष्ट होता है कि NGT की न्यायशास्त्र (jurisprudence) सर्वोच्च न्यायालय के पर्यावरणीय दृष्टिकोण के अनुरूप है।
7. Environmental Compensation: दंड नहीं, सुधार
NGT की दृष्टि में Environmental Compensation—
- Penalty नहीं,
- बल्कि Corrective & Restorative Measure है।
इसी कारण EC की राशि—
- पीड़ितों में सीधे वितरित न होकर,
- Environment Restoration Activities (जैसे afforestation, river rejuvenation, soil remediation)
में खर्च की जाती है।
8. निष्कर्ष
Environmental Compensation और NGT Jurisprudence ने भारतीय पर्यावरण कानून को व्यवहारिक, प्रभावी और उत्तरदायित्वपूर्ण बनाया है।
आज स्थिति यह है कि—
- प्रदूषक चाहे निजी हो या राज्य,
- चाहे उद्योग हो या नगर निकाय,
उसे पर्यावरणीय क्षति की पूरी सामाजिक और पारिस्थितिक लागत वहन करनी होगी।
यह न केवल Polluter Pays Principle की सच्ची अभिव्यक्ति है, बल्कि भावी पीढ़ियों के पर्यावरणीय अधिकारों की रक्षा भी।
