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भारत में Polluter Pays Principle: सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों के संदर्भ में प्रदूषककर्ता के दायित्व की प्रकृति, क्षेत्र और विस्तार।


पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में “दोष प्रदूषक करता है, वह दायी होता है” (Polluter Pays Principle) आज भारतीय पर्यावरण न्यायशास्त्र का एक केन्द्रीय सिद्धांत बन चुका है। सर्वोच्च न्यायालय के नवीनतम एवं सतत निर्णयों ने प्रदूषककर्ता के दायित्व की प्रकृति, क्षेत्र और विस्तार को व्यापक एवं कठोर रूप में परिभाषित किया है।


1. दोष प्रदूषक करता है, वह दायी होता है: अवधारणा और विकास

Polluter Pays Principle का अर्थ है कि जो व्यक्ति या उद्योग पर्यावरण को प्रदूषित करता है, वही प्रदूषण से उत्पन्न क्षति की पूर्ति, पुनर्स्थापन (restoration) और निवारण (mitigation) का उत्तरदायी होगा। यह सिद्धांत अब केवल क्षतिपूर्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि पर्यावरण को उसकी मूल अवस्था में लौटाने तक विस्तारित हो चुका है।

भारतीय संदर्भ में इस सिद्धांत को सर्वोच्च न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) के अंतर्गत स्वच्छ पर्यावरण के अधिकार से जोड़ा है।
Vellore Citizens Welfare Forum v. Union of India, 1996, Supreme Court में न्यायालय ने स्पष्ट रूप से Polluter Pays Principle को भारतीय कानून का अंग घोषित किया।


2. प्रदूषककर्ता के दायित्व की प्रकृति (Nature of Liability)

(i) पूर्ण दायित्व (Absolute Liability)

प्रदूषक का दायित्व दोष-आधारित (fault-based) न होकर पूर्ण (absolute) होता है।
M.C. Mehta v. Union of India (Oleum Gas Leak Case), 1987, Supreme Court में यह सिद्धांत प्रतिपादित किया गया कि खतरनाक उद्योग किसी भी प्रकार की दुर्घटना या प्रदूषण के लिए बिना किसी अपवाद के उत्तरदायी होगा।

(ii) दंडात्मक नहीं बल्कि प्रतिपूरक + पुनर्स्थापनात्मक

नवीनतम दृष्टिकोण में दायित्व केवल जुर्माना भरने तक सीमित नहीं है, बल्कि—

  • पर्यावरणीय क्षति की वैज्ञानिक आकलन आधारित लागत
  • प्रभावित समुदाय को मुआवज़ा
  • प्राकृतिक संसाधनों का पुनर्जीवन (ecological restoration)
    भी शामिल है।
    यह दृष्टिकोण Indian Council for Enviro-Legal Action v. Union of India, 1996, Supreme Court में स्पष्ट किया गया।

3. दायित्व का क्षेत्र (Scope of Liability)

(i) प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष प्रदूषण

प्रदूषक का दायित्व केवल प्रत्यक्ष प्रदूषण तक सीमित नहीं है, बल्कि—

  • अपशिष्ट निपटान की लापरवाही
  • खतरनाक रसायनों का अनुचित भंडारण
  • दीर्घकालिक (cumulative) पर्यावरणीय क्षति
    पर भी लागू होता है।

Sterlite Industries (India) Ltd. v. Union of India, 2013, Supreme Court में भारी पर्यावरणीय क्षति के लिए उच्च क्षतिपूर्ति लगाई गई।

(ii) राज्य और निजी दोनों पर लागू

यदि प्रदूषण राज्य की एजेंसी द्वारा हुआ है, तब भी राज्य उत्तरदायित्व से मुक्त नहीं हो सकता।
M.C. Mehta v. Kamal Nath, 1997, Supreme Court में Public Trust Doctrine के साथ Polluter Pays Principle को जोड़ा गया।


4. दायित्व का विस्तार (Extent of Liability)

(i) पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति (Environmental Compensation)

राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) और सर्वोच्च न्यायालय ने environmental compensation को एक प्रभावी उपकरण के रूप में विकसित किया है।
Paryavaran Suraksha Samiti v. Union of India, 2017, Supreme Court में प्रदूषण फैलाने वाली इकाइयों को बंद करने और क्षतिपूर्ति लगाने के निर्देश दिए गए।

(ii) भविष्य की क्षति का निवारण

दायित्व का विस्तार केवल अतीत की क्षति तक सीमित नहीं है, बल्कि—

  • प्रदूषण रोकने हेतु तकनीकी सुधार
  • अनुपालन की लागत
  • दीर्घकालिक निगरानी खर्च
    भी प्रदूषक को वहन करने होते हैं।

5. प्रदूषण उपकृत (Pollution Control Framework) के संदर्भ में

प्रदूषण उपकृत का आशय उन विधिक एवं संस्थागत तंत्रों से है, जिनके माध्यम से प्रदूषण को नियंत्रित किया जाता है। इसमें—

  • जल (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1974
  • वायु (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1981
  • पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986
    शामिल हैं।

इन अधिनियमों के अंतर्गत प्रदूषक के दायित्व को Polluter Pays Principle के अनुरूप पढ़ा जाता है।
Goel Ganga Developers v. Union of India, 2018, Supreme Court में पर्यावरणीय स्वीकृति के उल्लंघन पर भारी पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति लगाई गई।


6. नवीनतम न्यायिक प्रवृत्ति

सर्वोच्च न्यायालय की नवीनतम प्रवृत्ति यह है कि—

  • Polluter Pays Principle अब सख्त संवैधानिक दायित्व बन चुका है।
  • आर्थिक अक्षमता या रोजगार का तर्क प्रदूषक के बचाव में स्वीकार्य नहीं है।
  • Sustainable Development और Inter-Generational Equity को प्राथमिकता दी जा रही है।

7. निष्कर्ष

अतः यह स्पष्ट है कि “दोष प्रदूषक करता है, वह दायी होता है” केवल एक नीति सिद्धांत नहीं, बल्कि भारतीय पर्यावरण कानून का मौलिक एवं बाध्यकारी नियम बन चुका है। प्रदूषककर्ता का दायित्व—

  • पूर्ण,
  • व्यापक, और
  • पर्यावरण पुनर्स्थापन तक विस्तारित
    हो चुका है। यह दृष्टिकोण न केवल वर्तमान पीढ़ी, बल्कि भावी पीढ़ियों के पर्यावरणीय अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करता है।


🔗 Suggested Linked Resources

  1. Polluter Pays Principle – Key Supreme Court Cases
  2. Environmental Compensation and NGT Jurisprudence 
  3. Article 21 and Right to Clean Environment

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