आज हम भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 के दो सबसे ज्यादा confuse करने वाले, लेकिन परीक्षा के नजरिए से सबसे महत्वपूर्ण प्रावधानों—धारा 3(5) और धारा 3(6)—के बीच के मुख्य अंतर (Main Differences) को गहराई से डिकोड करेंगे।
भले ही दोनों धाराएं तब लागू होती हैं जब कोई अपराध कई लोगों द्वारा मिलकर (by several persons) किया जाता है, लेकिन Criminal Law में दोनों के परिणाम (consequences) बिल्कुल अलग होते हैं।
आइए इसे अपने चिर-परिचित अंदाज़ और Short Tricks के साथ समझते हैं:
1. मूल सिद्धांत (The Basic Principle):
- धारा 3(5) - Common Intention (सामान्य आशय): यह धारा कहती है कि जब कोई आपराधिक कार्य कई व्यक्तियों द्वारा "सभी के सामान्य इरादे को आगे बढ़ाने" (in furtherance of the common intention of all) के लिए किया जाता है, तो हर व्यक्ति ऐसे जिम्मेदार होता है मानो वह काम उसने अकेले किया हो।
- Short Trick: "One for All, All for One" (सबके लिए एक सजा)।
- धारा 3(6) - Similar Knowledge or Intention (समान/अपना-अपना ज्ञान या आशय): यह धारा कहती है कि जब कोई कार्य केवल इसलिए आपराधिक है क्योंकि वह किसी 'आपराधिक ज्ञान या इरादे' के साथ किया गया है, और कई लोग इसमें शामिल होते हैं, तो हर व्यक्ति उसी ज्ञान या इरादे के साथ जिम्मेदार होगा जो उसके खुद के दिमाग में था।
- Short Trick: "Jaisa Irada, Waisi Saja" (अपना-अपना दिमाग, अपना-अपना अपराध)।
2. मस्तिष्कों का मिलन (Meeting of Minds / Pre-arranged Plan):
- धारा 3(5): इस धारा को लागू करने के लिए अपराधियों के बीच पहले से एक योजना (pre-arranged plan) या 'Meeting of minds' का होना अनिवार्य है। अपराध करने से पहले या उसी क्षण उनके बीच एक सहमति बननी चाहिए।
- धारा 3(6): इस धारा में पहले से कोई योजना होना जरूरी नहीं है। कई लोग घटनास्थल पर अचानक एक साथ आ सकते हैं और एक ही काम कर सकते हैं, लेकिन उनकी कोई साझा योजना नहीं होती।
3. सजा और देयता (Punishment and Liability):
- धारा 3(5): इसमें Joint Liability (संयुक्त देयता) का सिद्धांत पूरी तरह लागू होता है। भले ही मुख्य हमला किसी एक ने किया हो और दूसरा केवल बाहर पहरा दे रहा हो, दोनों को बिल्कुल एक समान अपराध (जैसे हत्या) की सजा मिलेगी।
- धारा 3(6): इसमें हर अपराधी की देयता (liability) उसके व्यक्तिगत इरादे से तय होती है। इसी सिद्धांत को BNS की धारा 3(9) और स्पष्ट करती है कि एक ही कार्य (Same Act) के लिए अलग-अलग अपराधियों को अलग-अलग अपराधों का दोषी ठहराया जा सकता है।
Practical Examples से अंतर समझें:
- धारा 3(5) का उदाहरण: A, B और C मिलकर एक बैंक लूटने और गार्ड को मारने की योजना बनाते हैं। A और B अंदर जाकर गार्ड को गोली मारते हैं, C बाहर बाइक स्टार्ट करके खड़ा रहता है। यहाँ चूँकि उनका 'Common Intention' था, इसलिए तीनों (A, B, C) हत्या और लूट के दोषी माने जाएंगे।
- धारा 3(6) और 3(9) का उदाहरण: मान लीजिए Z ने A को अचानक भयंकर गाली दी (grave provocation)। A गुस्से में आकर Z को पीटने लगता है। उसी समय B वहाँ से गुजरता है। B की Z से पुरानी दुश्मनी है और वह हमेशा से Z को मारना चाहता था। B इस मौके का फायदा उठाकर A के साथ मिलकर Z को पीटता है और Z मर जाता है। यहाँ A और B के बीच कोई 'योजना' नहीं थी। उन्होंने काम एक ही किया, लेकिन इरादे अलग थे। इसलिए धारा 3(6) और 3(9) के तहत A केवल 'आपराधिक मानव वध' (Culpable Homicide) का दोषी होगा (क्योंकि वह प्रकोपन में था), जबकि B 'हत्या' (Murder) का दोषी होगा (क्योंकि उसका इरादा हत्या का था)।
Landmark Case Law - Mahbub Shah v. Emperor (1945):
इसे "Indus River Case" भी कहा जाता है। इस मामले में प्रिवी काउंसिल ने पुरानी IPC की धारा 34 (अब BNS धारा 3(5)) और धारा 35 (अब BNS धारा 3(6)) के बीच का अंतर स्पष्ट करते हुए कहा था कि "समान आशय" (Similar Intention) और "सामान्य आशय" (Common Intention) के बीच बहुत बड़ा फर्क है। सिर्फ इसलिए कि दो लोग एक ही समय पर एक ही व्यक्ति पर हमला कर रहे हैं, अदालत यह नहीं मान सकती कि उनका 'सामान्य इरादा' (Common Intention) था। बिना पूर्व-योजना के यह केवल 'Similar Intention' (धारा 3(6)) का मामला बनेगा।
So students, in the courtroom, if you are the Prosecution, try to prove 'Pre-arranged plan' to hit everyone with Section 3(5). But if you are the Defense Lawyer, try to prove that there was no meeting of minds, break the common intention, and use Section 3(6) to reduce the liability of your client! Keep your concepts crystal clear and keep revising!
