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BNS की धारा 3(9) क्या है?

आज हम भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 3(9) का विस्तार से विश्लेषण (detailed analysis) करेंगे। यह धारा आपराधिक न्यायशास्त्र (criminal jurisprudence) के एक बहुत ही महत्वपूर्ण सिद्धांत को स्थापित करती है—'एक ही कार्य द्वारा अलग-अलग अपराध' (Different offences by the same act)।

धारा 3(9) का कानूनी प्रावधान (Legal Provision): 

BNS की धारा 3(9) के अनुसार, जहाँ कई व्यक्ति किसी आपराधिक कार्य (criminal act) को करने में लगे हुए हैं या शामिल हैं, वहाँ वे उस एक ही कार्य के आधार पर अलग-अलग अपराधों (different offences) के दोषी हो सकते हैं।

सरल भाषा में इसका अर्थ (Meaning in Simple Words): 

आसान भाषा में समझें—कानून कहता है कि भले ही दो या दो से अधिक लोगों ने मिलकर एक ही जुर्म को अंजाम दिया हो (यानी उनका Physical Act एक ही हो), लेकिन अगर उनके दिमाग में चल रहा इरादा (Intention) अलग-अलग है, या उन पर लागू होने वाली परिस्थितियां (जैसे Provocation/प्रकोपन) अलग हैं, तो उन्हें एक जैसी सजा नहीं मिलेगी। हर व्यक्ति अपने खुद के 'Mens Rea' (आपराधिक मनःस्थिति) के अनुसार अलग-अलग अपराध का दोषी माना जाएगा।

Short Trick for Memory: 

Exams के लिए इस कांसेप्ट को "OADO Rule" (One Act, Different Offences) या "अपना-अपना इरादा, अपना-अपना अपराध" की ट्रिक से याद रखें।

पिछली धाराओं के साथ कानूनी जुड़ाव (Connection with Conversation History):

याद कीजिए, जब हमने अपने पिछले लेक्चर्स में 'समान ज्ञान या आशय' (Similar Knowledge or Intention) वाली धारा 3(6) पर चर्चा की थी, तब मैंने आपको इसी सिद्धांत की एक झलक दी थी। धारा 3(9) वास्तव में धारा 3(6) का ही व्यावहारिक दृष्टांत (practical illustration) है। जहाँ धारा 3(5) (Common Intention) सभी को एक ही लाठी से हांकती है (सबको एक जैसी सजा), वहीं धारा 3(9) हर अपराधी के व्यक्तिगत इरादे को अलग-अलग तौलती है।

वैधानिक दृष्टांत (Statutory Illustration): 

BNS में इसे एक बहुत ही क्लासिक उदाहरण से समझाया गया है जो जुडिशियल एग्जाम्स का फेवरेट है: मान लीजिए 'A', 'Z' पर अचानक और गंभीर प्रकोपन (grave provocation) के तहत हमला करता है। इस प्रकोपन के कारण, यदि Z की मौत हो जाती है, तो A का कृत्य 'हत्या की श्रेणी में न आने वाले आपराधिक मानव वध' (culpable homicide not amounting to murder) की श्रेणी में आएगा। उसी समय 'B', जिसकी Z से पुरानी दुश्मनी (ill-will) है और जो Z को मारना चाहता है, मौके का फायदा उठाकर Z को मारने में A की मदद करता है। ध्यान दें, B को किसी ने उकसाया (provoke) नहीं था। फैसला (Verdict): यहाँ, यद्यपि A और B दोनों Z की मौत का कारण बनने वाले एक ही कृत्य में शामिल हैं (One Act), लेकिन B का इरादा पहले से हत्या का था, इसलिए B 'हत्या' (Murder) का दोषी है, और A केवल 'आपराधिक मानव वध' (Culpable Homicide) का दोषी है।

(Expert Note: आपकी न्यायिक परीक्षाओं की बेहतरीन तैयारी के लिए मैं यहाँ कुछ अतिरिक्त जानकारी दे रहा हूँ जो वर्तमान स्रोतों (BNS text) से बाहर की है, जिसे आप स्वतंत्र रूप से verify कर सकते हैं:) 

Supreme Court Insight: 

पुरानी भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 38 ही अब BNS की धारा 3(9) बन गई है। सुप्रीम कोर्ट ने कई ऐतिहासिक फैसलों में स्पष्ट किया है कि यह धारा 'Common Intention' (सामान्य आशय) का अपवाद (exception) है। यदि A और B के बीच पहले से Z को मारने की 'Meeting of Minds' (योजना) होती, तो दोनों को हत्या (Murder) की सजा मिलती। लेकिन चूंकि यहाँ उनकी कोई पूर्व-योजना नहीं थी और वे सिर्फ घटना स्थल पर एक साथ शामिल हुए, इसलिए कोर्ट ने धारा 3(9) लगाकर उनके 'व्यक्तिगत इरादे' के आधार पर उन्हें अलग-अलग अपराधों का दोषी ठहराया।

So my dear aspirants, always remember that in Indian Criminal Law, the physical act does not blindly decide the punishment for all co-accused; the individual's mental state (Mens Rea) plays the ultimate deciding role! Keep your concepts crystal clear and keep revising this OADO rule.

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