भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 के तहत 'सद्भावपूर्वक' (Good Faith) केवल एक कानूनी शब्द नहीं है, बल्कि यह वह सुरक्षा कवच (protective shield) है जो निर्दोष लोगों और अपनी ड्यूटी करने वालों को सजा से बचाता है। पूरे आपराधिक कानून में जहाँ 'Mens Rea' (आपराधिक मनःस्थिति / Guilty Mind) को अपराध का मूल माना जाता है, वहीं 'सद्भावपूर्वक' किया गया कार्य यह साबित करता है कि व्यक्ति का इरादा गलत नहीं था।
BNS की धारा 2(11) में 'सद्भावपूर्वक' (Good Faith) को बहुत ही स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया है, जिसके अनुसार किसी भी बात को "सद्भावपूर्वक" किया गया या माना गया नहीं कहा जा सकता, यदि वह "सम्यक् सतर्कता और ध्यान" (due care and attention) के बिना की गई हो।
Memory Trick: एग्जाम्स के लिए इसे DCA फार्मूला से याद रखें: Due Care and Attention। यदि किसी कार्य में DCA (उचित सावधानी और ध्यान) गायब है, तो वहां Good Faith नहीं हो सकता।
Let us deeply analyze the extreme importance of 'Good Faith' across various chapters of the BNS:
1. साधारण अपवादों (General Exceptions) का मुख्य आधार: अध्याय III (Chapter III) में दिए गए अधिकांश बचाव 'सद्भावपूर्वक' किए गए कार्यों पर ही टिके हैं:
- Mistake of Fact (तथ्य की भूल): धारा 14 और 17 के तहत यदि कोई व्यक्ति तथ्य की भूल के कारण सद्भावपूर्वक (in good faith) यह विश्वास करता है कि वह किसी कार्य को करने के लिए कानून द्वारा बाध्य (bound by law) है या न्यायोचित (justified) है, तो उसका कार्य अपराध नहीं माना जाता है।
- Doctors and Surgeons (चिकित्सकों के लिए बचाव): धारा 26 और 30 मेडिकल प्रोफेशनल्स के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं। यदि कोई सर्जन किसी मरीज के फायदे के लिए सद्भावपूर्वक (in good faith) कोई ऑपरेशन करता है (भले ही उससे मृत्यु का जोखिम हो), तो वह अपराध नहीं है यदि मरीज ने सहमति दी हो। इसी तरह, धारा 30 के अनुसार यदि कोई दुर्घटना का शिकार व्यक्ति बेहोश है (सहमति देने में असमर्थ है), और डॉक्टर उसके फायदे के लिए तुरंत सद्भावपूर्वक उसका इलाज करता है या ऑपरेशन करता है, तो डॉक्टर को पूर्ण कानूनी बचाव मिलता है।
- Communication made in good faith (सद्भावपूर्वक दी गई सूचना - धारा 31): यदि कोई सर्जन सद्भावपूर्वक किसी मरीज को उसकी गंभीर बीमारी के बारे में बताता है और सदमे से मरीज की मृत्यु हो जाती है, तो डॉक्टर ने कोई अपराध नहीं किया है क्योंकि यह सूचना मरीज के फायदे के लिए सद्भावपूर्वक दी गई थी।
2. लोक सेवकों और न्यायपालिका के कार्यों में (Acts of Public Servants & Judges):
- Judges (न्यायाधीश): धारा 15 के अनुसार, एक न्यायाधीश द्वारा न्यायिक रूप से कार्य करते हुए किया गया कोई भी कार्य अपराध नहीं है, जिसे वह सद्भावपूर्वक विश्वास करता है कि उसे कानून द्वारा दिया गया है।
- Public Servants (लोक सेवक): धारा 37 स्पष्ट करती है कि यदि कोई लोक सेवक अपने पद के अधिकार के तहत सद्भावपूर्वक (in good faith) कोई कार्य करता है, जिससे मृत्यु या गंभीर चोट का उचित अंदेशा न हो, तो आम जनता को उसके खिलाफ प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार (right of private defence) उपलब्ध नहीं होता है।
- हत्या के अपवाद (Exceptions to Murder): धारा 101 के अपवाद 3 के तहत, यदि कोई लोक सेवक सार्वजनिक न्याय के लिए कार्य करते हुए अपने अधिकारों से आगे निकल जाता है, लेकिन वह यह सद्भावपूर्वक (in good faith) विश्वास करता है कि उसका कार्य कानूनी और आवश्यक था, तो वह हत्या (Murder) का दोषी नहीं होगा।
3. मानहानि (Defamation) के मामलों में सबसे बड़ा बचाव: BNS की धारा 356 (मानहानि) के तहत कई अपवाद (Exceptions) सीधे तौर पर 'Good Faith' पर निर्भर हैं।
- लोक सेवक के आचरण या किसी सार्वजनिक प्रश्न पर सद्भावपूर्वक अपनी राय व्यक्त करना मानहानि नहीं है।
- लोक भलाई के लिए, या अपने हितों की रक्षा के लिए किसी के चरित्र पर सद्भावपूर्वक लांछन (imputation) लगाना, या किसी को चेतावनी (caution) देना भी मानहानि की श्रेणी में नहीं आता है।
Supreme Court Insight : As a law aspirant, you must know that the Hon'ble Supreme Court of India has deeply interpreted this concept in landmark cases like Sukaram v. State of MP and Bhawoo Jivaji v. Mulji Dayal (decided under the old IPC section 52, which is identical to BNS Sec 2(11)).
The Supreme Court has clearly established that mere 'good intention' (नेक इरादा) is not equal to 'good faith'. The person must act logically and cautiously. For example, if a quack (झोलाछाप डॉक्टर) performs a critical surgery with a good intention to save a life but without any medical qualifications, the Supreme Court rules that there is no 'due care and attention', and hence he cannot take the defense of 'good faith' under General Exceptions.
So students, remember that 'Good Faith' is the ultimate legal test of a person's reasonable conduct and lack of negligence, which acts as a primary defense throughout the Bharatiya Nyaya Sanhita! Keep revising.
