आज हम भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 3(4) पर विस्तार से चर्चा करेंगे, जो आपराधिक कानून का एक बहुत ही बुनियादी और महत्वपूर्ण सिद्धांत (foundational concept) है।
BNS की धारा 3(4) स्पष्ट रूप से यह प्रावधान करती है कि इस संहिता के प्रत्येक भाग में, जब तक कि संदर्भ से कोई विपरीत आशय (contrary intention) प्रतीत न हो, किए गए कार्यों (acts done) को दर्शाने वाले शब्दों का विस्तार 'अवैध चूकों' (illegal omissions) पर भी लागू होता है।
सरल शब्दों में इसका अर्थ (Meaning in Simple Words): Criminal Law में आम तौर पर यह माना जाता है कि किसी को चोट पहुँचाना या कोई गलत काम 'करना' (Act) ही अपराध है। लेकिन धारा 3(4) यह स्थापित करती है कि कानून की नजर में 'कुछ गलत करना' (Act) और 'कानूनी कर्तव्य होने के बावजूद कुछ न करना' (Illegal Omission), दोनों समान रूप से दंडनीय हैं।
Short Trick for Memory: Exams और Court Practice के लिए इसे हमेशा "A = IO" के फार्मूले से याद रखें:
- A = Act (कार्य)
- IO = Illegal Omission (अवैध चूक) यानी, पूरे क्रिमिनल लॉ में जहाँ भी "कार्य" (act) शब्द आता है, वहाँ आपको स्वतः ही "अवैध चूक" (illegal omission) को भी शामिल मानना है।
अन्य धाराओं के साथ कानूनी जुड़ाव (Legal Connection with Other Sections): एक बेहतरीन वकील बनने के लिए आपको इस धारा को BNS की परिभाषाओं (Definitions) के साथ जोड़कर पढ़ना आना चाहिए:
- धारा 2(15) के साथ जुड़ाव: धारा 3(4) में सबसे महत्वपूर्ण शब्द है "अवैध" (Illegal)। हर प्रकार की चूक (omission) अपराध नहीं होती; केवल वही चूक अपराध है जो अवैध हो। BNS की धारा 2(15) 'अवैध' (illegal) और 'करने के लिए कानूनी रूप से बाध्य' (legally bound to do) को परिभाषित करती है। कोई भी कार्य न करना (omission) तभी अवैध होगा जब आप उस काम को करने के लिए कानूनी रूप से बाध्य (legally bound) थे, लेकिन आपने उसे नहीं किया।
- धारा 2(1) और 2(25) के साथ जुड़ाव: कानून यह भी स्पष्ट करता है कि 'कार्य' (act) का अर्थ केवल एक कार्य नहीं बल्कि कार्यों की एक श्रृंखला (series of acts) भी है। इसी तरह, 'चूक' (omission) का अर्थ केवल एक बार की चूक नहीं बल्कि चूकों की पूरी श्रृंखला (series of omissions) भी होता है।
व्यावहारिक उदाहरण (Practical Examples to clear the concept): आइए 'Moral Duty' (नैतिक कर्तव्य) और 'Legal Duty' (कानूनी कर्तव्य) के बीच के अंतर को उदाहरण से समझते हैं:
- दृष्टांत 1 (Moral Duty - No Offence): मान लीजिए 'A' एक सड़क से गुजर रहा है और देखता है कि एक व्यक्ति पानी में डूब रहा है। 'A' को अच्छी तरह तैरना आता है, फिर भी वह उस व्यक्ति को नहीं बचाता (omission) और व्यक्ति डूब कर मर जाता है। यहाँ 'A' ने कोई अपराध नहीं किया है। किसी अजनबी को बचाना 'A' का नैतिक कर्तव्य था, लेकिन वह ऐसा करने के लिए "कानूनी रूप से बाध्य" (legally bound) नहीं था। इसलिए 'A' का यह कृत्य 'अवैध चूक' (Illegal Omission) नहीं है।
- दृष्टांत 2 (Legal Duty - Murder): 'A' एक जेलर है और 'Z' नाम के कैदी का प्रभार (charge) उसके पास है। 'A', कैदी 'Z' की मृत्यु कारित करने के इरादे से, उसे अवैध रूप से खाना नहीं देता है (illegally omits to supply Z with food)। लगातार खाना न मिलने के कारण 'Z' भूख से मर जाता है। यहाँ जेलर 'A' कैदी को खाना देने के लिए कानूनी रूप से बाध्य था। उसका यह कार्य एक 'Illegal Omission' है। धारा 3(4) के नियम "A = IO" के तहत, जेलर 'A' को हत्या (Murder) का दोषी माना जाएगा, ठीक वैसे ही जैसे उसने कैदी को किसी हथियार (Act) से मारा हो।
Supreme Court Insight : (ध्यान दें: यह जानकारी मेरे वर्तमान स्रोतों से बाहर की है, जिसे आप अपनी न्यायिक परीक्षाओं की स्वतंत्र तैयारी के लिए सत्यापित कर सकते हैं) सुप्रीम कोर्ट ने पुराने IPC की धारा 32 (जो अब BNS की धारा 3(4) है) की व्याख्या Om Prakash vs State of Punjab के ऐतिहासिक मामले में की थी। इस मामले में एक पति अपनी पत्नी को जानबूझकर खाना नहीं देता था ताकि वह भूख से मर जाए। सुप्रीम कोर्ट ने इसी सिद्धांत को लागू करते हुए कहा कि एक पति अपनी पत्नी का भरण-पोषण करने के लिए कानूनी रूप से बाध्य है। पत्नी को खाना न देना एक 'अवैध चूक' (Illegal Omission) माना गया और पति को हत्या के प्रयास (Attempt to Murder) का दोषी ठहराया गया।
