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BNS की धारा 3(5) में सामान्य इरादे (Common Intention) का सिद्धांत क्या है?

आज हम आपराधिक कानून (Criminal Law) के सबसे महत्वपूर्ण और प्रसिद्ध सिद्धांतों में से एक - 'सामान्य इरादे' (Common Intention) के सिद्धांत पर चर्चा करेंगे।

भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 के 'प्रारंभिक' (Preliminary) अध्याय की धारा 3(5) में संयुक्त देयता (Joint Liability) का प्रावधान किया गया है। यह धारा स्पष्ट रूप से स्थापित करती है कि जब कोई आपराधिक कार्य कई व्यक्तियों द्वारा उन सभी के 'सामान्य इरादे' (common intention) को आगे बढ़ाने के लिए किया जाता है, तो उनमें से प्रत्येक व्यक्ति उस कार्य के लिए ठीक उसी प्रकार उत्तरदायी (liable) होता है, मानो वह कार्य उसने अकेले ही किया हो।

Simple Example for clear understanding: इसे आसान भाषा में समझें। मान लीजिए 4 लोग (A, B, C और D) मिलकर Z के घर डकैती और हत्या की योजना (Pre-arranged plan) बनाते हैं। योजना के अनुसार, A और B घर के अंदर जाकर Z की हत्या कर देते हैं, C दरवाजे पर बंदूक लेकर पहरा देता है, और D घर के बाहर कार स्टार्ट करके खड़ा रहता है ताकि सब आसानी से भाग सकें।

यहाँ C और D ने Z को छुआ तक नहीं है, लेकिन चूँकि यह पूरा कार्य उन सभी के 'सामान्य इरादे' (common intention) को आगे बढ़ाने के लिए किया गया था, इसलिए धारा 3(5) के तहत C और D को भी हत्या के लिए बिल्कुल वैसे ही जिम्मेदार माना जाएगा और सजा मिलेगी जैसे कि उन्होंने खुद अपने हाथों से Z की हत्या की हो।

Short Trick for Memory (C-A-P Rule): Exams के लिए इसे हमेशा "C-A-P" फार्मूला से याद रखें:

  • C = Common Intention (सभी का एक सामान्य इरादा होना चाहिए)।
  • A = Act done by several persons (आपराधिक कार्य कई व्यक्तियों द्वारा मिलकर किया गया हो)।
  • P = Punished as if done by him alone (हर व्यक्ति को ऐसे सजा मिलेगी मानो उसने वह अपराध अकेले किया हो)।

(Expert Note: मेरे द्वारा दिए गए BNS के वर्तमान स्रोतों में केस लॉ और विस्तृत व्याख्याएं शामिल नहीं हैं, इसलिए आपकी बेहतरीन तैयारी के लिए मैं Indian Penal Code (IPC) की पुरानी धारा 34 (जो अब BNS की धारा 3(5) है) से जुड़े सुप्रीम कोर्ट और प्रिवी काउंसिल के कुछ ऐतिहासिक फैसले जोड़ रहा हूँ। आप अपनी स्वतंत्र तैयारी के लिए इन्हें वेरीफाई कर सकते हैं।)

Supreme Court & Landmark Judgments (Outside Sources):

  1. Barendra Kumar Ghosh v. King Emperor (1925) - "The Post Office Case": यह Common Intention का सबसे बड़ा और ऐतिहासिक केस है। इस मामले में प्रिवी काउंसिल (Privy Council) ने एक बहुत ही शानदार लाइन कही थी - "They also serve who only stand and wait" (वे लोग भी अपराध में भागीदार होते हैं जो केवल घटनास्थल पर खड़े रहते हैं और प्रतीक्षा करते हैं)। यदि आप किसी अपराध स्थल पर केवल पहरा भी दे रहे हैं, लेकिन आपकी पूर्व-योजना (pre-arranged plan) थी, तो आप मुख्य अपराधी के समान ही दोषी हैं।

  2. Mahbub Shah v. Emperor (1945) - "The Indus River Case": इस केस में यह स्पष्ट किया गया था कि 'Common Intention' (सामान्य इरादे) को लागू करने के लिए अपराधियों के बीच 'Meeting of Minds' (मस्तिष्कों का मिलन) या 'पूर्व-नियोजित योजना' (Pre-arranged plan) का होना बहुत जरूरी है।

  3. Suresh & Anr. v. State of U.P. (2001) - Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने इस केस में स्पष्ट किया कि धारा 34 (अब BNS की धारा 3(5)) अपने आप में कोई मूल अपराध (substantive offence) नहीं बनाती है, बल्कि यह केवल 'साक्ष्य का नियम' (Rule of Evidence) है जो यह तय करता है कि एक समूह (group) द्वारा किए गए अपराध के लिए हर व्यक्ति को कैसे जिम्मेदार ठहराया जाए।

So my dear aspirants, always remember the phrase "One for All, and All for One" when interpreting Section 3(5) of the BNS. Whenever multiple accused are involved in a crime with a pre-arranged plan, this section is the ultimate weapon for the prosecution to ensure everyone gets equal punishment! Keep your concepts crystal clear and keep revising.

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